बकरी पालन :

उत्तर प्रदेश में बकरियों की संख्या लगभग 1.30 करोड़ है जिसमें 15.45 प्रतिशत बरबरी, 3.33 प्रतिजमुनापारी एवं शेष अवर्णित (देशी) प्रजातियाँ हैदू, मांस चमड़ा जैसी बहुमूल्य सामग्री बकरियों द्वारा प्राप्त होती है साथ ही ग्रामीण अंचलों में बकरी पालन के क्षेत्र में रोजगार की असीम सम्भावनायें व्याप्त हैंयही कारण है कि प्रतिवर्ष 39.70 प्रतिशत बकरियों का उपयोग मांस के लिए करने के पश्चात इनकी संख्या 3.50 प्रतिशत की दर से बढ़ रही हैपरन्तु अच्छी नस्ल, उचित आहारीय व्यवस्था एवं सही रखरखाव के अभाव में इनका उत्पादन संतोषजनक हीं है। 

बकरी पालन की विशेषताएं

  • बकरी पालन कम पूँजी (अर्थात कम संख्या, कम स्थान, सस्ता आवास, घर के बेकाखाद्य पदार्थों अथवा मात्र चराई आदि) से शुरू किया जा सकता है
  • बकरियाँ 1012 माह में बच्चे देने योग्य हो जाती हैं तथा प्रायः एक से अधिक बच्चे देती हैं
  • करियाँ प्रत्येक जलवायु में अपने को आसानी से ढाल लेती हैं
  • बकरी का मांस सबसे अधिक लोकप्रिय है तथा इस पर कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है बल्कि कुछ खास अवसर जैसेहोली, दुर्गापूजा एवं बकरीद आदि पर सका महत्व बढ़ जाता है
  • बकरी पालन, भेड़ तथा गाय पालन की तुलना में 120 तथा 135 प्रतिशत क्रमश: अधिक लाभकारी है
  • बकरी प्रतिवर्ष लगभग 1000 रु0 शुद्ध लाभ देती है
  • एक बकरी प्रतिवर्ष लगभग 2 क्विंटल खाद उत्पन्न करती है।

बकरी पालन के महत्वपूर्ण तथ्य

1. उचित नस्ल का चुनाव: देश में बकरियों की लगभग 20 नस्लें हैं परन्तु उत्तर प्रदेश में दुग्ध उत्पादन हेतु जमुनापारी तथा मांस हेतु बरबरी, मूल प्रजातियाँ सर्वश्रेष्ठ है।

  • जमुनापारी : यह नस्ल मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में पायी जाती है जो यमुना व चम्बल नदियों के कछार में स्थित है। जहाँ चराई की अच्छी सुविधा उपलब्ध होती है, वहाँ जमुनापारी अच्छी प्रकार पनपती है। यह बड़े आकार की बकरी है। इसका रंग प्रायः सफेद होता है। प्रथम बार गर्भ धारण करने में लगभग 1.50 वर्ष लग जाते हैं। यह प्रतिवर्ष एक बार में 1-2 बच्चे देती है। इस प्रजाति की बकरियाँ 190–200 दिनों के दुग्धकाल में लगभग 200 कि.ग्रा. दूध देती है अर्थात 1.0 कि.ग्रा. प्रतिदिन। वर्ष भर में इन बकरियों का शारीरिक भार 22-26 कि.ग्रा. तक हो जाता है।
  • बरबरी : यह मांस उत्पादन के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रजाति है जो आगरा, एटा, मथुरा एवं अलीगढ़ जिलों में पाई जाती है। यह एक साल के अन्दर प्रजनन योग्य हो जाती है। बरबरी एक बार में 2-3 बच्चे तथा दो साल में तीन बार बच्चे देती है। इस तरह एक मादा प्रतिवर्ष लगभग 3.5 गुना की दर से वंश वृद्धि करती है। यह बरबरी गुण देश के किसी अन्य प्रजाति में नहीं है। नर बच्चा एक साल में लगभग 15-18 कि.ग्रा. तक हो जाता है। मादा एक साल में लगभग 140 ली. दूध देती है। बरबरी प्रजाति को बाँधकर भी पाला जा सकता है।

2. प्रजाति का सुधार : बकरी पालक को चाहिए कि स्थानीय माँग के अनुसार अर्थात दूध के लिए जमुनापारी तथा मांस उत्पादन के लिए बरबरी नस्ल का पालन करें अथवा देशी प्रजाति को शुद्ध जमुनापारी या बरबरी से प्रजनन (क्रास) कराकर धीरे-धीरे अनुवांशिक सुधार करें। इसके लिए व्यवस्थित अथवा सरकारी फार्म से अच्छे गुणों वाला नर बच्चा क्रय करें। प्रति 20-25 बकरियों के लिए एक नर पर्याप्त होता है। एक साल बाद यह प्रजनन योग्य हो जाता है। उसके साथ के अन्य देशी नर बकरों को बेच दें अथवा बंध्याकरण करा दें ताकि अन्तः प्रजनन को रोका जा सके। इस तरह किसान अवर्णित नस्ल के समुदाय को कम खर्च द्वारा 2-3 वर्ष में वांछित नस्ल में परिवर्तित कर अधिक लाभ कमा सकते हैं।

3. प्रजनन हेतु बकरे का चुनाव : नस्ल सुधार में बकरे का योगदान आधा होता है। अत: समुदाय में सबसे स्वस्थ, निरोग, तेज वृद्धि दर, सुडौल शरीर, अधिक शारीरिक भार (वसा रहित) तथा फूर्तीले नर का चुनाव प्रजनन हेतु करना चाहिए। इसके अतिरिक्त नर का चुनाव करते समय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि इसकी माँ एक समय में ज्यादा बच्चे देती हो तथा दो ब्यात के बीच कम से कम अंतराल रखती हो।

4. आवास व्यवस्था : आवास सदैव ऊँचे एवं सूखे स्थान पर बनायें जहाँ नमी अथवा पानी न रहता हो। प्रत्येक पशु को कम से कम 1.00 वर्ग मी. स्थान देना चाहिए। आवास तक सूर्य की रोशनी पहुँचनी चाहिये। मई-जून में अत्यधिक तापमान एवं दिसम्बर-जनवरी में अत्यधिक शीत से बचाव हेतु छायेदार वृक्ष तथा पर्दे आदि की व्यवस्था करनी चाहिए। बीमारी से बचाव हेतु नियमित मल-मूत्र की सफाई करते रहना चाहिए।

5. प्रजनन व्यवस्था : प्रजनन हेतु प्रति 20-25 मादा पर एक नर बकरा रखना चाहिए। बकरी पालक उचित रख-रखाव एवं आहार प्रबंधन करें ताकि बकरी ब्यात के पश्चात तीन माह के अंदर पुनः गर्भधारण कर ले जिससे दो साल में तीन ब्यात मिल सके। बकरियों में मद चक्र 18-21 दिन तथा मद अवधि 24-48 घंटे का होता है। मद के लक्षण आने के 12 घंटे पश्चात इनका प्रजनन कराना चाहिये। बकरी पालक इस बात का ध्यान दें कि गर्भित कराने के पश्चात उनकी बकरी में 18-21 दिन के बीच पुनः मद के लक्षण तो नहीं दिखाई दे रहा है। यदि ऐसा है तो पुनः गर्भित करायें। लेकिन बार-बार ऐसा हो तो पशु-चिकित्सक की सलाह लें।

6. ब्यात के समय देखभाल : बकरियों में गर्भकाल लगभग 145 दिन का होता है अतः गर्भावस्था के अन्तिम 60 दिन तक 200 ग्राम दाना मिश्रण प्रतिदिन दें। ब्यात के 7-10 दिन पूर्व बकरी को चराई पर न भेजें। एक बच्चा से दूसरा बच्चा पैदा होने के बीच लगभग 15-20 मिनट लगता है। बच्चा पैदा होने के कुछ देर पश्चात् जेर स्वतः गिर जाता है। यदि 8-10 घंटे तक जेर नहीं गिरता है तो पशु-चिकित्सक से सलाह लें। ब्यात के पश्चात् बकरी को नम एवं हल्का गर्म चोकर खाने को देना चाहिए।

7. नवजात बच्चे की देखभाल : बच्चे को बकरी का पहला दूध (खीस) 2-3 दिन तक अवश्य पिलायें। इससे बीमारियों से बचाव में मदद मिलती है। नाल पर टिंचर आयोडिन लगाते रहना चाहिए। बच्चे को दिन में तीन-चार बार दूध पिलाएँ। माँ के दूध के अभाव में गाय का दूध पिलाया जा सकता है। दो-तीन सप्ताह बाद मुलायम हरा चारा देना प्रारम्भ करें। तीन सप्ताह में नर बच्चे का बंध्याकरण कराए, इससे मांस की गुणवत्ता बढ़ जाती है तथा जो चमड़ा प्राप्त होता है उसमें कोई दुर्गंध नहीं होती है। दो माह बाद बच्चे को दूध देना आवश्यक नहीं है।

8. आहार व्यवस्था : यदि अच्छा चारागाह, झाड़ियाँ एवं पौष्टिक हरा चारा उपलब्ध हो तो दाना मिश्रण देना आवश्यक नहीं है। अन्य परिस्थितियों में बढ़ते बच्चे को 100 ग्रा. दाना मिश्रण, प्रजनन के मौसम में नर को 200 ग्रा., गर्भित बकरियों (अंतिम 60 दिन) को 200 ग्रा. तथा एक ली. दूध देने वाली बकरियों को प्रति दिन 250 ग्रा. दाना मिश्रण देना चाहिए। दाना मिश्रण बनाने के लिए कोई भी सस्ता अनाज 50-60 प्रतिशत, दाल चूनी 20 प्रतिशत, खली 25 प्रतिशत, गेहूँ का चोकर या चावल का पालिस 10 प्रतिशत, खनिज मिश्रण 2 प्रतिशत तथा साधारण नमक 1 प्रतिशत स्थानीय उपलब्धता के आधार पर चयन कर तैयार करें। बकरियों का धीरे-धीरे आहार परिवर्तन करें। अधिक रसीला चारा जैसे बरसीम, लूसर्न, लोबिया अधिक मात्रा में न खिलाएं इससे अफरा हो सकता है। सुबह अतिशीघ्र जब तक घासों पर ओस लगा हो तथा जलभराव क्षेत्रों में बकरियों को चरने न भेजें इससे अन्तः परजीवी का प्रकोप हो सकता है।

9. स्वास्थ्य व्यवस्था : बकरी पालक को हमेशा सतर्क रहना चाहिए कि कहीं उनकी बकरी बीमार तो नहीं है। बकरी का समुदाय से अलग रहना, चराई नहीं करना, साथ-साथ न चल पाना, सुस्त एवं उतरा चेहरा, सर नीचे करके खड़े होना, शरीर का तापमान 103° फा. से ज्यादा होना, मुँह, नाक, कान, आँख अथवा मल-मूत्र के रास्ते खून, मवाद, कीचड़ आना आदि बीमारी के लक्षण हैं। ऐसी दशा में तुरंत पशु-चिकित्सक से सलाह लें।

न्यूमोनिया : अत्यधिक ठंड एवं भारी र्षा में यदि बकरी का रख रखाव ठीसे हीं होता है तो न्यूमोनिया हो सकता है और यह बीमारी जानलेवा हो सकती है, क्योंकि न्यूमोनिया होने के पश्चात फेफड़े में जीवाणु, विषाणु एवं माईकोप्लाज्मा का संक्रमतेजी से होता हैबकरियों को श्वॉस लेने में कठिनाहोने लगती हैं जिससे मृत्यु हो जाती है। 

दस्त : बकरियों में दस्त के कई कारण होते हैं। प्रायः दस्त परजीवियों, जीवाणु एवं विषाणु के संक्रमण से होता है। इसका मुख्य कारण दूषित आहार एवं जल ग्रहण करना है।

अफरा : बकरियों में अफरा साधारणतया खानपान में असावधानी के कारहोता है यदि करियाँ स्वभाव के अनुरुकुअधिक खा लेती हैं, जैसे मोटे अनाज, मक्का, गेहूँ, चावल, धान, बाजरा एवं हरा चारा जैसेबरसी, जई इत्यादिऐसी दशा में बकरियों के पेट के न्दर जो गैस बनता है वह बाहर नहीं निकल पाता और फरा हो जाता है