मुगी पालन

मुर्गी पालन व्यवसाय हमारे देश में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है और लाखों लोगों के रोजी रोटी का साधन बन गया हैगरीबी उन्मूलन एवं बेरोजगानवयुवकों के लिए यह एक अच्छा व्यवसाय साबित हो रहा हैनार्बाड (न.. बी..आर.डी.) एवं अन्य लीड बैंक इस व्यवसाय को लोकप्रिय बनाने हेतु ऋण भी मुहैया करा ही हैंलेकिसाधन सम्पन्न होते हुये भी, उत्तप्रदेश में आवश्यकता के अनुरुप उत्पादन होने के कारण आज भी दक्षिण भारत से अण्डे एवं मुर्गी के मांस की पूर्ति की जा रही हैअतः प्रदेश में मुर्गी उत्पाद को बढ़ाने के लिए निम्नलिखिघटकों पर ध्यान देना आवश्यक है

उन्नतिशील प्रजातियाँ : आजकल अनुसंधान केन्द्रों एवं कुछ प्राइवेट संस्थाओं ने अंडे देने वाली ऐसी उन्नतिशील प्रजातियाँ विकसित की है जिनका उत्पादन 300 से अधिक अण्डों का है जो देशी मुर्गियों की अपेक्षा 4 से 5 गुना अधिक हैं। इसी तरह मांस वाली (ब्रॉयलर/ क्रॉयलर) प्रजातियाँ 6 सप्ताह में 1.50 कि.ग्रा. मांस दे रही हैं। वनराजा प्रजाति घर के पिछवाड़े मुर्गी पालन हेतु उपयुक्त प्रजातियाँ 150 अण्डे तथा उसके बाद 2.5-3.00 कि.ग्रा. मांस देने की क्षमता रखती हैं। उदाहरणार्थ- केन्द्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान, बरेली द्वारा विकसित कैरी-प्रिया, कैरी-सोनाली (अण्डे वाली प्रजाति), कैरी-श्यामा, कैरी-निर्भीक, कैरी-देवन्द्रा (घर के पिछवाड़े मुर्गी पालन हेतु) तथा कैरिब्रो धनराज एंव कैरिब्रो मृत्युंज्य (मांस वाली प्रजाति) उपयुक्त हैं। संतुलित आहार : दूसरी समस्या संतुलित आहार की है। मुर्गी आहार का मुख्य भाग मक्का उत्तर प्रदेश में अधिक होता है लेकिन दूसरा भाग मूंगफली के खली का अभाव है हलाँकि, आजकल मुर्गियों का आहार अलग-अलग श्रेणियों के लिए विभिन्न कम्पनियों द्वारा व्यवसायिक स्तर पर बनाये जा रहे हैं और बाजार में उचित दाम पर उपलब्ध हैं। आवृत तापक्रम नियंत्रण : उत्तर प्रदेश में मई-जून की अत्यधिक गर्मी (40° से अधिक) तथा दिसम्बर-जनवरी की ठंढ़क (15° से कम) भी मुर्गी की उत्पादकता को 20 प्रतिशत तक प्रभावित करती हैं इसलिए मुर्गी पालक को चाहिए कि मुर्गी घर के दक्षिण तथा पश्चिम दिशा में शहतूत (मलवारी) के वृक्ष लगायें जो गर्मी में छाया तथा जाड़े में पत्तियाँ गिर जाने के पश्चात् धूप दें। इसके अतिरिक्त पर्दे, पानी का छिड़काव, छत पर घास-फूस बिछाकर एवं आवश्यकतानुसार, खिड़कियों को खोलकर अथवा बन्द रखकर तापमान पर नियंत्रण करना चाहिए। संक्रामक रोगों से बचाव : बचाव इलाज से कारगर है यह कहावत मुर्गी पालन में सटीक बैठती है अगर एक बार किसी बीमारी का संक्रमण हो गया तो पूरा समुदाय नष्ट हो सकता है। अतः इनसे बचाव के लिए टीकाकरण ही सबसे सस्ता एवं कारगर उपाय है।

अन्य रोगों से बचाव:

1. सफेद दस्त/बैसिलरी व्हाईट डायरिया/प्लुलोरम बीमारी : 

यह रोग मुख्यतः चूजों में होता है, जिससे काफी अधिक संख्या में चूजों की मृत्यु होती है। बाद में यह बड़ी मुर्गियों में भी फैलता है। रोग से ग्रसित मुर्गियों के अंडों में भ्रूण मर जाते है। रोगी मुर्गियों की बीट चूने जैसी सफेद होती है तथा मल विसर्जन के समय दर्द होता है, कुछ पक्षी अंधे या लंगड़े भी हो जाते हैं। चूजे एवं मुर्गियों का पिछला भाग दस्त के कारण चिपक जाता है।

उपचार

क) टेट्रासाइक्लिन/लिक्सेन/फयूरासोल पाउडर दवा : यह दवा सभी पशु दवा दुकान में उपलब्ध रहती है20 चूजे अथवा 5 बड़ी मुर्गियों के लिये एक कप पानी (50 मि.ली.) में 2 चुटकी (2 ग्राम) दवा घोलें एवं सिरिंज द्वारा बीमार चूजों को दोदो बूंद एवं बड़ी मुर्गियों को पांचपांच बूंद तीन दिनों तक लगातार पिलाने से बीमारी दूर की जा सकती हैपीने के पानी में दवा घोलकर भी पिलायी जा सकती हैइस पद्धति में 40 चूजे अथवा 10 बड़ी मुर्गियों के लिए एक तसला पानी (1 लीटर) में 4 चुटकी (4 ग्राम) दवा मिलाकर मुर्गी में रखे पानी बर्तमें दवा डाल दें एवं प्रभावित चूजे या मुर्गियों को अपनी इच्छानुसार इस पानी को पीने देंऐसा तीन दिनों तक करें

रोकथाम : बिछौना, मुर्गीघर वं उसके आस पास की जगह की साफ सफाका पूरा ध्यान रखा जाना चाहिटेट्रासाइक्लिन पाउड/लिक्सेन पाउडर/फयूरासोपाउडरउपर बतायी गयी दवा को आधी मात्रा में पीने वाले पानी में देने से इसकी रोकथाम की जा सकती है। 

2. खूनी पेचिश/खूनी दस्त/कॉक्सीडियोसिस : यह रोग मुख्यतः पक्षी खने के स्थापर नमी के कारण होता हैसबसे प्रमुख लक्षण खूनी दस्त होता हैप्रभाविचूजे खाना नहीं खाते हैं, पंखों को नीचे झुकाकर रखते हैं, लगी का रंभूरा होने के साथसाथ, अंडोत्पादन कम हो जाता हैइस रोग से चूजे काफी मजोहो जाते हैं एवं आँख मूंदकर बैठ जाते हैंबीमारी से काफी बड़ी संख्या में पक्षियों की मृत्यु हो जाती हैयह रोग क्षियों को करीब तीन सप्ताह की आयु में लगता है जो बाद में बड़ी मुर्गियों में भी फैलता 

उपचार : कॉक्सीडिया रोधक दवायें जैसे एम्प्रोसोल, सल्फाक्वीनॉक्सेलिन, सल्फामीराजीन आदि बाजार में उपलब्ध हैवा को उपर दर्शायी गई मात्रा के अनुसार दाने में मिलाकर तीन दिनों तक प्रभावित मुर्गियों को देना चाहिएसाथसाथ विटामिन एवं खनिज मिश्रण को पानी में मिलाकर देने से भी रोग को नियंत्रित किया जा सकता 

रोकथाम : इस रोग की रोकथाम के लिए मुर्गियों का बिछावन या मुर्गी घर का फर्श सूखा तथा साफ रखना चाहिए। बिछावन गीली होने पर चूना मिलाकर बिछावन को पलट देना चाहिए। उपरोक्त औषधियों में से किसी एक को दाना में मिलाकर या पीने के पानी में मिला कर पिलाए। दवा युक्त पानी के साथ सादा पानी न दें। रोकथाम के लिए 2-3 माह तक या जब तक आवश्यकता हो, दवा देनी चाहिए। 3. मुर्गियों में सर्दी जुकाम : ठंड के समय, वर्षा में भीगने पर या खुले में बाहर रहने पर मुर्गियों को खास कर चूजों को यह बीमारी हो जाती है। मुर्गियों का सुस्त रहना, कलगी में नीलापन, दाना पानी कम खाना एवं चोच से पतला स्राव आना प्रमुख लक्षण है। चूजे एवं मुर्गियाँ पास-पास आकर झुंड बना लेते हैं। इससे यह बीमारी और भी फैलती है। उपचार : टेट्रासाइक्लिन, स्टेक्लिन आदि की 1/4 टैबलेट सुबह-शाम खिलावें। सल्फाडिमीडीन (16 प्रतिशत घोल) 10 मि.ली., 1 लीटर पानी में मिलाकर पिलावें।