मुर्गी पालन व्यवसाय हमारे देश में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है और लाखों लोगों के रोजी रोटी का साधन बन गया है। गरीबी उन्मूलन एवं बेरोजगार नवयुवकों के लिए यह एक अच्छा व्यवसाय साबित हो रहा है। नार्बाड (एन.ए. बी.ए.आर.डी.) एवं अन्य लीड बैंक इस व्यवसाय को लोकप्रिय बनाने हेतु ऋण भी मुहैया करा रही हैं। लेकिन साधन सम्पन्न होते हुये भी, उत्तर प्रदेश में आवश्यकता के अनुरुप उत्पादन न होने के कारण आज भी दक्षिण भारत से अण्डे एवं मुर्गी के मांस की पूर्ति की जा रही है। अतः प्रदेश में मुर्गी उत्पाद को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित घटकों पर ध्यान देना आवश्यक है।
1. सफेद दस्त/बैसिलरी व्हाईट डायरिया/प्लुलोरम बीमारी :
यह रोग मुख्यतः चूजों में होता है, जिससे काफी अधिक संख्या में चूजों की मृत्यु होती है। बाद में यह बड़ी मुर्गियों में भी फैलता है। रोग से ग्रसित मुर्गियों के अंडों में भ्रूण मर जाते है। रोगी मुर्गियों की बीट चूने जैसी सफेद होती है तथा मल विसर्जन के समय दर्द होता है, कुछ पक्षी अंधे या लंगड़े भी हो जाते हैं। चूजे एवं मुर्गियों का पिछला भाग दस्त के कारण चिपक जाता है।
उपचार
क) टेट्रासाइक्लिन/लिक्सेन/फयूरासोल पाउडर दवा : यह दवा सभी पशु दवा दुकान में उपलब्ध रहती है। 20 चूजे अथवा 5 बड़ी मुर्गियों के लिये एक कप पानी (50 मि.ली.) में 2 चुटकी (2 ग्राम) दवा घोलें एवं सिरिंज द्वारा बीमार चूजों को दो–दो बूंद एवं बड़ी मुर्गियों को पांच–पांच बूंद तीन दिनों तक लगातार पिलाने से बीमारी दूर की जा सकती है। पीने के पानी में दवा घोलकर भी पिलायी जा सकती है। इस पद्धति में 40 चूजे अथवा 10 बड़ी मुर्गियों के लिए एक तसला पानी (1 लीटर) में 4 चुटकी (4 ग्राम) दवा मिलाकर मुर्गी घर में रखे पानी बर्तन में दवा डाल दें एवं प्रभावित चूजे या मुर्गियों को अपनी इच्छानुसार इस पानी को पीने दें। ऐसा तीन दिनों तक करें।
रोकथाम : बिछौना, मुर्गीघर एवं उसके आस पास की जगह की साफ सफाई का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। टेट्रासाइक्लिन पाउडर/लिक्सेन पाउडर/फयूरासोल पाउडर–उपर बतायी गयी दवा को आधी मात्रा में पीने वाले पानी में देने से इसकी रोकथाम की जा सकती है।
2. खूनी पेचिश/खूनी दस्त/कॉक्सीडियोसिस : यह रोग मुख्यतः पक्षी रखने के स्थान पर नमी के कारण होता है। सबसे प्रमुख लक्षण खूनी दस्त होता है। प्रभावित चूजे खाना नहीं खाते हैं, पंखों को नीचे झुकाकर रखते हैं, कलगी का रंग भूरा होने के साथ–साथ, अंडोत्पादन कम हो जाता है। इस रोग से चूजे काफी कमजोर हो जाते हैं एवं आँख मूंदकर बैठ जाते हैं। इस बीमारी से काफी बड़ी संख्या में पक्षियों की मृत्यु हो जाती है। यह रोग पक्षियों को करीब तीन सप्ताह की आयु में लगता है जो बाद में बड़ी मुर्गियों में भी फैलता
उपचार : कॉक्सीडिया रोधक दवायें जैसे एम्प्रोसोल, सल्फाक्वीनॉक्सेलिन, सल्फामीराजीन आदि बाजार में उपलब्ध है। दवा को उपर दर्शायी गई मात्रा के अनुसार दाने में मिलाकर तीन दिनों तक प्रभावित मुर्गियों को देना चाहिए। साथ–साथ विटामिन एवं खनिज मिश्रण को पानी में मिलाकर देने से भी रोग को नियंत्रित किया जा सकता
रोकथाम : इस रोग की रोकथाम के लिए मुर्गियों का बिछावन या मुर्गी घर का फर्श सूखा तथा साफ रखना चाहिए। बिछावन गीली होने पर चूना मिलाकर बिछावन को पलट देना चाहिए। उपरोक्त औषधियों में से किसी एक को दाना में मिलाकर या पीने के पानी में मिला कर पिलाए। दवा युक्त पानी के साथ सादा पानी न दें। रोकथाम के लिए 2-3 माह तक या जब तक आवश्यकता हो, दवा देनी चाहिए। 3. मुर्गियों में सर्दी जुकाम : ठंड के समय, वर्षा में भीगने पर या खुले में बाहर रहने पर मुर्गियों को खास कर चूजों को यह बीमारी हो जाती है। मुर्गियों का सुस्त रहना, कलगी में नीलापन, दाना पानी कम खाना एवं चोच से पतला स्राव आना प्रमुख लक्षण है। चूजे एवं मुर्गियाँ पास-पास आकर झुंड बना लेते हैं। इससे यह बीमारी और भी फैलती है। उपचार : टेट्रासाइक्लिन, स्टेक्लिन आदि की 1/4 टैबलेट सुबह-शाम खिलावें। सल्फाडिमीडीन (16 प्रतिशत घोल) 10 मि.ली., 1 लीटर पानी में मिलाकर पिलावें।